जिन घऱ बेटी पैदा होती ;दुख के कारे बदरा आते
क्या जीवन तेरा रंग अभागिन;मानो मिट्टी मोल लगाते .
एक हाड़ और मांस बने है ;फिर भी इतना भेद है क्यूं
बेटा है फूलों की बगिया ;बेटी काँटों की खेप है ज्यों .
बेटा पहने रेशम पोषक ;बेटी चिथड़े में रानी
बचपन से ही पैदा होती ;बेटी की ये नग्न कहानी .
शिक्षा रूपी दवा भी आई ;कुछ को तो शिक्षित कर पाई
फिर भी रूढ़ि के अंध कुएं में ;बर्बरता की है खाई .
कभी कोख में खंजर घौपे ;कभी बलात्कार हो जाता है .
कहते ख़ुद को पुरुष है जो ;वह क्यूं दानव बन जाता है .
समय बदलता है ;हमारी सोच भी बदलती जाती है .
क्यूं बेटियों के लिए सारे नियम ;और बेटों को आजादी है .
क्यूं हर बात के लिए हम ;सरकार को जिम्मेदार ठहराते है
क्यूं समय की दरकार पर हम ;नए नियम नही बनाते है
चलो मिलकर करें नई पहल ;आओ सब एक कसम उठाए
बेटियों के साथ -साथ बेटों को भी संस्कार सिखाए .
भ्रूण हत्या हो या दुष्कर्म .ये मात्र क़ानून से नही मिट पाएंगे
ये रोग बहुत भयानक है ;संस्कार ही इन्हें मिटायेगे